शरीक-ए हयात दौलत, तरीक़-ए हयात है अना
है हाफज़े मे कमी कोई, कुछ याद नही रहता
आगाज़ करता हूं जो कुछ, आबाद नही रहता
आदमी हूँ आदमी की तरह ही सोचता हूँ मैं
पल में होजाता हूँ कुछ और जांबाज़ नही रहता
रहूँ दिल मे किसी के मेरी भी ख़्वाहिश है
मजबूर हूं, खुद से कभी आज़ाद नही रहता
जब भी मिलता है वो, नई याद छोड़ जाता है
हज़ार यादों में वो खुद मगर याद नही रहता
खामोश रहने मे भलाई है ऐसा लगता है हसनैन
खून के रिश्ते भी आजकल दराज नही रहता
सूना पड़ा है वो घर लोग भी चुपचाप रहते हैं
बचपना रहता था जहाँ कल, आज नही रहता
बड़े हो गए बच्चे जो क़द से, उम्र से छोटे थे
अना की बड़ी इमारत में अब प्यार नही रहता
शायद ज़ेहानतकी कमी है, मिट गए वो लफ्ज़
अब बड़ों से गुफ्तगू मे अदब एहतराम नही रहता
शरीक-ए हयात दौलत, तरीक़-ए हयात है अना
कौन अपना, कौन बेगाना अब ध्यान नही रहता
रास्ते जुदा हो जाते हैं, एक ही मंज़िल के लिए
एक दुसरे पे जब बाहमी एतबार नही रहता
रिश्तों को समेट कर रखना कहाँ रहा मुमकिन
वो हो जाता है, जिसका कोइ गुमान नही रहता
Labels: ग़ज़ल


0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home