माँ के लिए माँ जैसी एहसास होना चाहता हूं
दूर बहुत रह लिया अब पास आना चाहता हूं
अपनी अदासे अब उसको रास आना चाहता हूं
जुदा-जुदा अपने-अपने हम कामोंमें मसरूफ रहे
आ जाओ जानम तेरा, लिबास होना चाहता हूं
ख़्वाब रहे अधूरे, ख़्वाहिश भी, मैं भी रहा अधूरा
बाहर निकलके अन्दरसे परवाज़ पाना चाहता हूं
तेरे इंतज़ारमें काटे तन्हाई के सब दिन और रात
मोहब्बतकी खुशहालीका आगाज़ होना चाहता हूं
मेरे बगैर तुने भी जितने दिन काटे क़हतहालीके
खुशियोंके समंदरका वो साल लाना चाहता हूं
बिछड़े हुए दोस्तोंसे इत्तेफ़ाक़ से अब मिलते हैं
दोस्तोंके हर राज़का हमराज होना चाहता हूं
बैसाखीका सहारा है अब बूढ़े कांपते हांथों को
उंगलियों के इशारोंका आवाज़ होना चाहता हूं
ऐसा न हो के गुमान रहे, मेरे छोटे बच्चों को
क्या होता है वो भी जानें, बाप होना चाहता हूं
आँचल में हम पल लिए अब बारी उनकी है
माँ के लिए माँ जैसी एहसास होना चाहता हूं
बना मदारी मुझपर सब डमरू डुगडुगाता है
नाचूं अपनी मर्ज़ी से, सब आप होना चाहता हूं
Labels: गजल


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