तुझे जागता हुआ इंसान बनाते हैं
चलो फिर तुझे एक आवाज़ सुनाते हैं
कहा दिलने फिर एक ख्वाब दिखाते हैं
टुटे हुए सपनोको जोड़कर पंख लगाते हैं
चलो फिर तुझे एक परवाज़ कराते हैं।
कब तलक जिन्दगीको दूर से देख कर
अफसोस करोगे जलोगे अंदर ही अंदर
कब तलक उम्मीद में खड़े रहोगे बुत की तरह
चलो तुझे जागता हुआ इंसान बनाते हैं।
संग टकराएगी तो आवाज़ भी आएगी
एक आवाज़ की खातिर हर संग टकराते हैं
बांध मुट्ठी, हौसला कर और संग उठा
चलो इस आवाज़ से एक साज़ बनाते हैं ।
क्या देखना है, क्या बेहतर है तेरे लिए
जो है, यही चाहता था? बेहतर है तेरे लिए ?
क़दम बढ़ा गर झूठ है, इसपे लानत भेज
ढा कर इस दीवार को फिर नया दीवार बनाते हैं ।
Labels: Hindi poetry, New poetry, तुझे जागता हुआ इंसान बनाते हैं, हिंदी कविता


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