खुदा खूब जानता है काफिर कौन मुसलमान कौन ?
ज़मीर अपनी अपनी देखे लोग झूठा कौन सच्चा कौन
किसी पर तोहमत लगा देने से हकीकत नहीं बदलती
लोग किरदार से देखते हैं बुरा कौन अच्छा कौन
मेरी हर बात से एक माखूज तो निकाल लोगे तुम
बात की गहराई से पता चलता है छोटा कौन बड़ा कौन
किसी को क्यों बताना अपनी अहलियत के बारे में
सखावत सब बताती है दाना कौन नादां कौन
किरदारकशी खूब करना आ गया है तुमको हसनैन
मकाम-ए-फाएज पर बैठा है देखो कहां कौन कहां कौन
हथेली की लकीरों को मिटाना मुमकिन नहीं है दोस्त
माज़ी भरी हुई है इब्रतसे बाखुदा कौन नाखुदा कौन
जालिमो याद रखो जुल्म हमेशा कायम नहीं रहता
लोग जल्द ही भूल जाते हैं यहां कौन वहां कौन
Labels: Hindi poetry


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