खुद ही ज़ालिम, और खुद मज़लूम हूँ मैं
खुद ही ज़ालिम, और खुद मज़लूम हूँ मैं
फ़क़त तेरे लिए क़ातिल और मक़तूल हूँ मैं
जा खुदा करे तेरे हिस्सेमें हर खुशी आए
कुछ मत सोंच मेरे बारे में , मजनून हूँ मैं
तसल्ली रखना, तेरे रास्ते नही आऊंगा मैं
तुझसे बड़ी दूर बाशिंदा-ए-शहर-ए-रंगून हूँ मैं
सुना है हर किसीसे मेरी खूबी बयान करते हो
बहुत शुक्रिया ऐ दोस्त, तेरा ममनून हूँ मैं
कहीं मेरे बदनाम किस्से न सुना देना किसको
माश्कुक हूं अभी भी दायरा-ए-क़ानून हूँ मैं
के जी रहा हूँ, अगर चे इस हालमें हुं हसनैन
के अपने अंदर ही मुर्दा खुद मदफ़ून हूँ मैं
Labels: ग़ज़ल


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