Thursday, March 10, 2022

हक़ नही बातिल ज़माना चाहता है



हक़ नही बातिल ज़माना चाहता है

अदलिया भी जाहिल ज़माना चाहता है

मर गया ज़मीर, मर गई इंसानियतभी 

मसनदपे क़ातिल ज़माना चाहता है


क्योंकि खुद्दारी बांकी नही है अब 

बाज़ार में व्यापारी बांकी नही है अब 

हैं लुटेरे सड़कोंपे खादी पहने हुए 

क़ौम में जिम्मेदारी बांकी नही है अब 


निज़ाम चलता है कानूनके बर-अक्स

अक्ल वालों से आगे चल रहे हैं बे-अक्ल 

क्या बीमारी है कोई हक़ नहीं बोलता

सहमा बैठा है, हर तबक़ा, हर शख्स


क्यूं सिर्फ तोहमत है तेरे दीन केलिए

हर रोज़का ये तमाशा है बेदीन केलिए

हांथ बांध कर न बैठ ऐ हक़ के सिपाही

उठा फुरकान बेबस, बे-ज़मीर केलिए 


देखले हाल क्या है ज़ेहन खोल अपना 

उठा कुरआन, दिलका सेहन खोल अपना 

ज़िंदगी जेर न कर मिटा गफलत अपनी

याद कर कौन है तु, लीबादा खोल अपना 


बेखुदाओंसे डर कर भागते क्यों हो 

फितनागरोंके फितनेसे कांपते क्यूं हो 

सचका साथ न छोड़ झूठ गिर जाएगा

वक़्त बदला है तो वापस फिर आएगा


उठ कर फक़त चलनेकी देर है तुम्हे  

बस तन्हा खुदसे लड़ने की देर है तुम्हे 

तेरे पीछे हुजूम खुद निकल आएगा 

काली बदरी को सूरज निगल जाएगा

एक चिंगारी शोला बना चाहता है 

ज़ुल्म अब जड़ से मिटा चाहता है 

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