हाय ये मुहब्बत तेरी क़ुर्बत के लिए दूर किये जाता है
हाय ये मुहब्बत तेरी क़ुर्बत केलिए दूर किये जाता है
और सितम ये के ला-सितम मजबूर किये जाता है
नाम रटता हुआ दिनरात गुज़रता है लम्हा लम्हा
ईक पल की ये फुरक़त बईद बदस्तूर किये जाता है
मुझ तन्हाको इस भीड़से कब निकलना होगा नसीब
ख्वाब सभी सच करने में मुझको चूर किये जाता है
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मैं सिपाही तो नही, इस जंग का मगर क्यों हूँ अमीर
ये हसरत की सज़ा है ? जो मज़दूर किये जाता है
कब ये सोंचा था साथ रहने के लिए यूँ तड़पना होगा
घूरता ताकता ये वक़्त मुझे बेनूर किये जाता है
एक मासुमसा इल्तजा तो मेरा सुनता जा "हसनैन"
क्यूँ ज़िन्दगी बेहिस, बेसुकुन, बेसुरुर किये जाता है ?
Labels: ग़ज़ल




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