कलमा-ए-हक़ भूलकर अगर कसीदे पढ़ो ( ग़ज़ल )
कलमा-ए-हक़ भूलकर अगर कसीदे पढ़ो
मजलिस-ए-शूरा में कुर्सी दिला सकता हुं ।
हर महकमे में एक वफादार है मेरा अब
सचको झूठ, झुठको सच बना सकता हुं ।
खेल सियासतका समझमे आगया है मुझे
अब अवामको उंगली पर नचा सकता हुं।
इस जम्हूरियतकी ताकतसे अब न डरा
तुझे इसी भीड़की भेंट चढ़ा सकता हूं ।
बदलता जा रहा हूं अपने तरीकेसे सब
हर इन्कलाब को फर्जी बना सकता हुं ।
तुम तख्तनशीन हो तो ये मत भूल जाना
कुर्सी की एक पैर हटाकर गिरा सकता हूं
इस मुल्क में आवाम ही मालिक है अपना
तुझे बनाया है तो कोई औरभी ला सकता हूं
तुम फिरऔन, नमरूदको भी याद रखना
आवाम हूं, तुझे, तेरी हस्ती मिटा सकता हूं
Labels: ग़ज़ल





0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home