वहीं मुंजमिद हूं उसी राहपे
वहीं मुंजमिद हूं उसी राह पे कोई साथ नही देता
तेरे ठुकराए हुओं को अब कोई हांथ नही देता
क्या करूं अब तेरे नाम से वाबस्तगी मुझको
चाह कर भी मुझे दूसरा कोई नाम नहीं देता
अगर पत्थर बना देते तो कहीं बिक ही जाता
क्या बनाया है, कहीं भी कोई दाम नहीं देता
इक दफा आ और फिर से मुझे कोरा कर दे
हर एक तहरीर रुलाता है आराम नही देता
तुम किस अज़ीयत में मुझे फंसा गए हसनैन
इशारा खुला हुआ है पर कोई राह नहीं देता
लेखक : मो. हसनैन मंसूरी
Labels: ग़ज़ल



0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home