Saturday, July 8, 2023

वहीं मुंजमिद हूं उसी राहपे




वहीं मुंजमिद हूं उसी राह पे कोई साथ नही देता

तेरे ठुकराए हुओं को अब कोई हांथ नही देता


क्या करूं अब तेरे नाम से वाबस्तगी मुझको

चाह कर भी मुझे दूसरा कोई नाम नहीं देता


अगर पत्थर बना देते तो कहीं बिक ही जाता

क्या बनाया है, कहीं भी कोई दाम नहीं देता


इक दफा आ और फिर से मुझे कोरा कर दे

हर एक तहरीर रुलाता है आराम नही देता 


तुम किस अज़ीयत में मुझे फंसा गए हसनैन

इशारा खुला हुआ है पर कोई राह नहीं देता


लेखक : मो. हसनैन मंसूरी

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