Monday, March 28, 2022

कलमा-ए-हक़ भूलकर अगर कसीदे पढ़ो ( ग़ज़ल )



कलमा-ए-हक़ भूलकर अगर कसीदे पढ़ो

मजलिस-ए-शूरा में कुर्सी दिला सकता हुं ।


हर महकमे में एक वफादार है मेरा अब

सचको झूठ, झुठको सच बना सकता हुं ।


खेल सियासतका समझमे आगया है मुझे

अब अवामको उंगली पर नचा सकता हुं।


इस जम्हूरियतकी ताकतसे अब न डरा

तुझे इसी भीड़की भेंट चढ़ा सकता हूं ।


बदलता जा रहा हूं अपने तरीकेसे सब

हर इन्कलाब को फर्जी बना सकता हुं ।


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तुम तख्तनशीन हो तो ये मत भूल जाना

कुर्सी की एक पैर हटाकर गिरा सकता हूं 


इस मुल्क में आवाम ही मालिक है अपना

तुझे बनाया है तो कोई औरभी ला सकता हूं


तुम फिरऔन, नमरूदको भी याद रखना

आवाम हूं, तुझे, तेरी हस्ती मिटा सकता हूं 

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Sunday, March 27, 2022

हाय ये मुहब्बत तेरी क़ुर्बत के लिए दूर किये जाता है


हाय ये मुहब्बत तेरी क़ुर्बत केलिए दूर किये जाता है 

और सितम ये के ला-सितम मजबूर किये जाता है


नाम रटता हुआ दिनरात गुज़रता है लम्हा लम्हा

ईक पल की ये फुरक़त बईद बदस्तूर किये जाता है


मुझ तन्हाको इस भीड़से कब निकलना होगा नसीब

ख्वाब सभी सच करने में मुझको चूर किये जाता है


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मैं सिपाही तो नही, इस जंग का मगर क्यों हूँ अमीर

ये हसरत की सज़ा है ? जो मज़दूर किये जाता है


कब ये सोंचा था साथ रहने के लिए यूँ तड़पना होगा

घूरता ताकता ये वक़्त मुझे बेनूर किये जाता है


एक मासुमसा इल्तजा तो मेरा सुनता जा "हसनैन"

क्यूँ ज़िन्दगी बेहिस, बेसुकुन, बेसुरुर किये जाता है ?


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Friday, March 25, 2022

होके रानी भी तेरे ठोकरोंमें पड़ी रहती हूं मैं ( नज़्म )


खता कैसी है के ज़ुल्म ही ज़ुल्म सहती हूं मैं

होके रानी भी तेरे ठोकरोंमें पड़ी रहती हूं मैं
तुम मुझे चाहकर भी आजाद नहीं होने देते 
तेरी मर्ज़ीसे बदलती हूं, जीती हूं, मरती हूं मैं 

दिन-रात तेरी खिदमतमें लगी रहती हूं मैं
बनके साया तेरे साथ हमराह चलती हूं मैं
किस मिट्टीके हो तुम जो मोम होने नही देता
मैं पिघलती हूं, आसुओंमें बहती रहती हूं मैं 

तुझको, तेरी आधी दुनियां, पूरी करती हूं मैं
तेरी खुशियोंमें हंसती हूं, तेरे ग़ममें रोती हूं मैं 
मुमताज़, कभी हीर, कभी साेनी बनती हूं मैं
फक़त तेरे लिए बिखरती,संवरती, सजती हूं मैं

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मेरे ख्वाबमें क्यूं अपनी रंग भर नहीं सकते ?
मैं जो करती हुं, क्या तुम सब कर नही सकते ?
जानेमन तेरी हर मर्ज़में बिनते-तबीब बनती हूं मैं
तेरे गुस्से से डरती हुं, और प्यारभी करती हूं मैं 

छोड़कर जाती नहीं, के बिखर जाओगे तुम
डर लगा रहता है ये कब बदल जाओगे तुम 
आग उठाना पड़े, एकबार उफ्फ नही करती
बेअसर होके तंज ओ ताना से सब्र करती हूं मैं

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Monday, March 21, 2022

खुदा खूब जानता है काफिर कौन मुसलमान कौन ?


खुदा खूब जानता है काफिर कौन मुसलमान कौन
ज़मीर अपनी अपनी देखे लोग झूठा कौन सच्चा कौन

किसी पर तोहमत लगा देने से हकीकत नहीं बदलती
लोग किरदार से देखते हैं बुरा कौन अच्छा कौन

मेरी हर बात से एक माखूज तो निकाल लोगे तुम
बात की गहराई से पता चलता है छोटा कौन बड़ा कौन

किसी को क्यों बताना अपनी अहलियत के बारे में
सखावत सब बताती है दाना कौन नादां कौन 

किरदारकशी खूब करना आ गया है तुमको हसनैन
मकाम-ए-फाएज पर बैठा है देखो कहां कौन कहां कौन
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हथेली की लकीरों को मिटाना मुमकिन नहीं है दोस्त
माज़ी भरी हुई है इब्रतसे बाखुदा कौन नाखुदा कौन 

जालिमो याद रखो जुल्म हमेशा कायम नहीं रहता
लोग जल्द ही भूल जाते हैं यहां कौन वहां कौन

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Thursday, March 17, 2022

जुबां खोलते हैं, हक़के सबब और कुछ भी नहीं



हम मांगते हैं तुझसे अमन और कुछ भी नहीं 

हम हैं इंसान सहल तलब और कुछ भी नहीं 


मचा है कोहराम शहरमे भूखकी, मुफलिसी की 

तुझसे फ़क़त कामकी तलब  और कुछ भी नहीं 


एक आवाज़के सिवा क्या है हम गरीबोंके पास 

जुबां खोलते हैं, हक़के सबब  और कुछ भी नहीं 


जुल्मकी रस्सी नहीं थाम सकते, गैरत केलिए 

कत्ल हो जाएंगे सचके सबब और कुछ भी नहीं 


मुझे गुनह्गारोंकी तरह सफ में खड़े  नही होना 

जिंदगीसे फ़क़त इतनी गरज़ और कुछ भी नहीं 


हर सलामका जवाब हँसके इसलिए देता हूँ मैं 

दीनकी है फ़क़त इतनी समझ और कुछ भी नहीं 


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Tuesday, March 15, 2022

खुद ही ज़ालिम, और खुद मज़लूम हूँ मैं


खुद ही ज़ालिम, और खुद मज़लूम हूँ मैं 

फ़क़त तेरे लिए क़ातिल और मक़तूल हूँ मैं 


जा खुदा करे तेरे हिस्सेमें हर खुशी आए 

कुछ मत सोंच मेरे बारे में , मजनून हूँ मैं 


तसल्ली रखना, तेरे रास्ते नही आऊंगा मैं

तुझसे बड़ी दूर बाशिंदा-ए-शहर-ए-रंगून हूँ मैं 


सुना है हर किसीसे मेरी खूबी बयान करते हो

बहुत शुक्रिया ऐ दोस्त, तेरा ममनून हूँ मैं 


कहीं मेरे बदनाम किस्से न सुना देना किसको

माश्कुक हूं अभी भी दायरा-ए-क़ानून हूँ मैं 


के जी रहा हूँ, अगर चे इस हालमें हुं हसनैन

के अपने अंदर ही मुर्दा खुद मदफ़ून हूँ मैं 

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Thursday, March 10, 2022

हक़ नही बातिल ज़माना चाहता है



हक़ नही बातिल ज़माना चाहता है

अदलिया भी जाहिल ज़माना चाहता है

मर गया ज़मीर, मर गई इंसानियतभी 

मसनदपे क़ातिल ज़माना चाहता है


क्योंकि खुद्दारी बांकी नही है अब 

बाज़ार में व्यापारी बांकी नही है अब 

हैं लुटेरे सड़कोंपे खादी पहने हुए 

क़ौम में जिम्मेदारी बांकी नही है अब 


निज़ाम चलता है कानूनके बर-अक्स

अक्ल वालों से आगे चल रहे हैं बे-अक्ल 

क्या बीमारी है कोई हक़ नहीं बोलता

सहमा बैठा है, हर तबक़ा, हर शख्स


क्यूं सिर्फ तोहमत है तेरे दीन केलिए

हर रोज़का ये तमाशा है बेदीन केलिए

हांथ बांध कर न बैठ ऐ हक़ के सिपाही

उठा फुरकान बेबस, बे-ज़मीर केलिए 


देखले हाल क्या है ज़ेहन खोल अपना 

उठा कुरआन, दिलका सेहन खोल अपना 

ज़िंदगी जेर न कर मिटा गफलत अपनी

याद कर कौन है तु, लीबादा खोल अपना 


बेखुदाओंसे डर कर भागते क्यों हो 

फितनागरोंके फितनेसे कांपते क्यूं हो 

सचका साथ न छोड़ झूठ गिर जाएगा

वक़्त बदला है तो वापस फिर आएगा


उठ कर फक़त चलनेकी देर है तुम्हे  

बस तन्हा खुदसे लड़ने की देर है तुम्हे 

तेरे पीछे हुजूम खुद निकल आएगा 

काली बदरी को सूरज निगल जाएगा

एक चिंगारी शोला बना चाहता है 

ज़ुल्म अब जड़ से मिटा चाहता है 

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तुझे जागता हुआ इंसान बनाते हैं


चलो फिर तुझे एक आवाज़ सुनाते हैं

कहा दिलने फिर एक ख्वाब दिखाते हैं

टुटे हुए सपनोको जोड़कर पंख लगाते हैं

चलो फिर तुझे एक परवाज़ कराते हैं।


कब तलक जिन्दगीको दूर से देख कर

अफसोस करोगे  जलोगे अंदर ही अंदर

कब तलक उम्मीद में खड़े रहोगे बुत की तरह 

चलो तुझे जागता हुआ इंसान बनाते हैं।


संग टकराएगी तो आवाज़ भी आएगी 

एक आवाज़ की खातिर हर संग टकराते हैं 

बांध मुट्ठी, हौसला कर और संग उठा 

चलो इस आवाज़ से एक साज़ बनाते हैं ।


क्या देखना है, क्या बेहतर है तेरे लिए

जो है, यही चाहता था? बेहतर है तेरे लिए ?

क़दम बढ़ा गर झूठ है, इसपे लानत भेज

ढा कर इस दीवार को फिर नया दीवार बनाते हैं ।



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Wednesday, March 9, 2022

मेरा हौसला


हां गिरते रहेंगे और उठते रहेंगे 

जिस तरह एक चींटी नही थकती

अपनी रोजमर्रा की जहमतसे, कसरतसे 

मेरा हौसला भी खुदा बढ़ाता है । 


अब वक्त है कुछ करने की 

अपनी ज़िद पे अड़ने की 

हद से आगे गुजरने की 

अगर सच्चा रहूं, पक्का रहूं 

तो मजबूर होगी दुनिया कदमों में झुकनेको ।


बातें बहुत सी हैं

कुछ सच्ची भी, कुछ झूठी भी 

मैं सचकी बात करता हूं, वो हैं.....

हौसला, मेहनत, मोहब्बत और उम्मीद 

मेरी उम्मीद मेरा हौसला है 

मेरी मेहनत मेरी तक़दीर है 

मेरी मोहब्बत मुझे एक उम्मीद देता है 

कोई शक नही मुझे मंजिल पाने में 

ये बात सच है 

और मेरा रब इसे पूरा करेगा 

मैं गिरता हूं, उठता हूं 

क्योंकि मेरा हौसला खुदा बढ़ाता है ।


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