Thursday, February 17, 2022

माँ के लिए माँ जैसी एहसास होना चाहता हूं


दूर बहुत रह लिया अब पास आना चाहता हूं 

अपनी अदासे अब उसको रास आना चाहता हूं 


जुदा-जुदा अपने-अपने हम कामोंमें मसरूफ रहे

आ जाओ जानम तेरा, लिबास होना चाहता हूं 


ख़्वाब रहे अधूरे, ख़्वाहिश भी, मैं भी रहा अधूरा 

बाहर निकलके अन्दरसे परवाज़ पाना चाहता हूं 


तेरे इंतज़ारमें काटे तन्हाई के सब दिन और रात

मोहब्बतकी खुशहालीका आगाज़ होना चाहता हूं 


मेरे बगैर तुने भी जितने दिन काटे क़हतहालीके 

खुशियोंके समंदरका वो साल लाना चाहता हूं 


बिछड़े हुए दोस्तोंसे इत्तेफ़ाक़ से अब मिलते हैं 

दोस्तोंके हर राज़का हमराज होना चाहता हूं 


बैसाखीका सहारा है अब बूढ़े कांपते हांथों को 

उंगलियों के इशारोंका आवाज़ होना चाहता हूं 


ऐसा न हो के गुमान रहे, मेरे छोटे बच्चों को 

क्या होता है वो भी जानें, बाप होना चाहता हूं 


आँचल में हम पल लिए अब बारी उनकी है 

माँ के लिए माँ जैसी एहसास होना चाहता हूं 


बना मदारी मुझपर सब डमरू डुगडुगाता है 

नाचूं अपनी मर्ज़ी से, सब आप होना चाहता हूं 


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Wednesday, February 16, 2022

दिमाग़ी तौर पर सेहतमंद रहनेका आसान तरीका



१)   ज़िंदगीमे तरतीब, नफासत, सफाई सुथराई होना चाहिए। जो शख्स साफ सफाई अपनाता है उसका बातिनभी  ( अन्तरमन ) शुद्ध होना शुरू हो जाता है। बातिन पाक ( शुद्ध ) होनेका मतलब है के आदमीके अंदरका बुग्ज़, किना, नफरत, गुस्सा, कम होना शुरू होजाता है। एक काग़ज़को आप तह दर तह मोड़कर रखें और उसी काग़ज़को दोनों हथेलीमें दबाकर मड़ोड़ दें।  दोनोंमें कितना अंतर है।

मराकबा ( ध्यान ) करना चाहिए ये विचारोंमें तरतीब पैदा करता है।  तरतीब खूबसूरती है। अगर तरतीब ख़राब हो तो बहुमूल्य चीज़ भी कुड़ेमें जाता है। 

" सूरह तौबा " की ये आयत   اِنَّ اللّٰهَ يُحِبُّ التَّـوَّابِيْنَ وَيُحِبُّ الْمُتَطَهِّرِيْنَ   अल्लाह तौबा करने( मांफी मांगने ) और पाक(साफ सुथरा) रहने वालोंको पसंद करता है।  आप सल्लल्लाह अलैहि व सल्लमने परमाया " आधा इमान सफाई है " तन यानि बाहरकी सफाईका सीधा सम्बन्ध है बातिन ( अंदर ) की सफाई से 

"Indiana"की रिसर्च रिपोर्ट कहती है, जिनका घर साफ़ रहता है वो ज़्यादा खुशहाल रहता है। जिस घरमे चीज़ें बेतरतीब और लोग गैर मुनज़्ज़म तरीक़े से रहते हों वहां Depression (तनाव) बढ़ जाता है। Stress और Depression शरीरमें Cortisol Hormone बढ़ता है और इंसान कई तरहके बीमारियोंका शिकार होने लगता है। तहज़ीब और तरतीबसे रहने में एक रुपिया खर्च नहीं होता।  आप पूरी दुनियाके लोगोंको सामने रखें और उनके लिए जो क़ाबिले एहतराम जगह हैं जैसे काबा, मस्जिद,मंदिर,चर्च,गुरुद्वारा,सिनेगॉग आदि इत्यादि। ये सभी जगहें साफ़ होती हैं। खुशबूदार होती हैं और यहाँ हर एक चीज़ तरतीबसे रखी होती है।  इसको कहते हैं "well maintained" तो आप ये समझिये की जो जितना साफ़ होगा उतना ही well maintained होगा 



२ ) दिमाग़को सेहतमंद रखनेका दूसरा तरीका है साफ़-सफ़ाईके साथ हर हालमें मुतमइन (संतुष्ट) रहना। हमेशा ताज़ा दम रहें क्यूंकि जिस्म बूढ़ा हो मगर जेहन जवान रहना चाहिए। आप अपने आसपास गौरसे देखिये एक साफ सफाईका काम करने वाला आदमी हमेशा मुतमइन रहता है और वो दिमागी और शारीरिक तौरसे बिलकुल चुस्त दुरुस्त रहते हैं। आप जबतक किसीभी चीज़को लेकर संतुष्ट नहीं होंगे चाहे वो संतान,धन-सम्पतिके मामलेमें ही हो आप खुश नहीं रह सकते। इसलिए अपने बच्चोंको सफ़ाईका ख्याल रखने और साथ संतुष्ट रहनेकी शिक्षा दीजिये।

३) Modern psychologist " Jordan Peterson " के पास जब कोई बीमार इलाज केलिए आता है तो वो इलाज करने से पहले कहते हैं पहले जाकर अपने कमरेका तरतीब ठीक करके आओ। अपने अंदर तमीज़, तहज़ीब और साफ़-सुथराई लेकर आओ।  इलाज बादमें होगा।  वो कहते हैं ये सब शुरू करनेसे इलाज शुरू हो जाता है। 

४) आखरी बात ये है की अल्लाह तआलाकी दी हुई सबसे बेहतरीन चीज़ हुस्न (सुंदरता) है और हुस्न असलमे एक तरतीबका नाम है। क़ुदरतको थोड़ा ध्यानसे देखेंगे तो आपको पता चलेगा हर एक चीज़ तरतीबमें है। उसमे आपको एक हृदम दिखेगा। बेतरतीबी कभी खूबसूरत हो ही नहीं सकता। 



निष्कर्ष : 

अपने अंदर और बहार सफाई-सुथराई लाएँ। चीजोंको तरतीबसे रखें। हर कामको एक सलीक़े(ढंग)से करें। उलझी हुई चीजोंको सुलझाएं (मेरा संकेत पारिवारिक कलहकी तरफ है) सब ठीक होजाएगा। जब चीज़ें अपनी-अपनी जगह तरतीबसे होगा तो खूबसूरत दिखेगा।  खूबसूरती हुस्न है और ये दिलको सुकून देता है।  जब दिल पुरसुकून और मुतमइन होगा दिमाग़ ख़ुद सेहतमंद होजाएगा। 

हिजाबपे बवाल, क्यों ? क्या सचमें हिजाब देस केलिए खतरा है ?

क्या सचमें हिजाब देस केलिए खतरा है ?


व्यवहारिक तौरपे देखा जाए तो आपको और मुझे जो पसंदीदा लिबास होता है वो हम और आप पहनते हैं । लोग कपड़ा तन ढकने और खूबसूरत लगने केलिए पहनते हैं । आजके दौरमें जहां हरकोई चुस्त और दुरुस्त रहना चाहता है, ऐसे में सबसे ज्यादा भूमिका कपड़ेका चुनावका होता है ।

कोई शर्ट पैंट पहनता है तो कोई कुर्ता पायजामा या कोई धोती कुर्ता । लड़कियों और औरतों केलिए साड़ी, कुर्ती सलवार, टी-शर्ट और जींस जैसे कपड़े आम तौर पर इस्तेमाल किए जाते हैं । लोग अपने मिजाज़, पसंद और अवसर अनुसार कपड़े पहनते हैं । भारतमे हमेशासे औरतें ऐसे कपड़े पहनती हैं जो उन्हें खूबसूरत बनाता है और साथ साथ उन्हें जो सुरक्षित लगता है। साड़ी जो सारा बदन ढकता है, पुराने समयसे अब तक चलता आ रहा है । लड़कियां कुर्ती सलवार भी दुपट्टाके साथ इस्तेमाल करती हैं ।




लड़कियोंके कपड़ेके के सवालमे हमेशासे मतभेद रहा है । देशमें जब लड़कियोके साथ बलात्कार और झेड़खानीके वारदात बढ़ने लगे तो लोगोंने कहा के आजकलकी लड़कियां मॉडर्न कपड़े ( टी-शर्ट, जींस और स्कर्ट ) पहनती हैं तो ये हादसे हो रहे है। लड़कियोंको चाहिए के वें ऐसे कपड़े पहने जो जिस्मके उत्तेजनात्मक हिस्सोंको छुपा सकें ।




आज इक्कीसवीं सदीमे औरते अपने हक़ और अधिकारके लिए पूरी दुनियांमें मोर्चे खोलकर बैठी हुई हैं । 

कौन क्या कपड़े पहने ये कभी डिबेटका मुद्दा ही नहीं रहा मगर तंग नजर लोग जो पराई औरतको बरहना(नंगा) देखना चाहते हैं हमेशा कोई न कोई बहाना बनाकर औरतोंको परेशान करते रहते हैं

"जब लड़कियां देसमें सुरक्षित नहीं रहीं, बलात्कार और छेड़खानी हदसे ज्यादा बढ़ने लगीं तो खुदको परदेमे क़ैद करने लगीं । मुसलमान औरतें और लड़कियां जिस तरह हिजाब या नकाबका इस्तेमाल करती थीं गैर मुस्लिम महिलाएं भी इसे अपनाने लगीं । भले और संस्कारी परिवारकी महिलाओं केलिए हिजाब एक सुरक्षा कवच बना और देसमें आमतौर पर इस्तेमाल होने लगा ।" 

इसका असर ये हुआ के जो वहशी और गंदे सोंचके घिनौने लोग थे उनके इरादे पस्त होने लगें । वे लोग बहाने ढूंढने लगे क्या हरकत किया जाए जिससे "सांप भी मरे और लाठी भी न टूटे" । जिन लोगोंका काम ही बुरा करना होगा वो सिर्फ बुरा ही सोचेंगे और बुरा ही करेंगे ।



आजकल पूरे देशमेें हिजाबको लेकर जो बवाल मचा हुआ है उसकी असल वजह कुछ और नही सिर्फ और सिर्फ औरतोंको बेपर्दा करना है । औरतोंको सरेआम बाजारोंमे जलील करना असल मकसद है ।


एक सवाल उन्हीं लोगोंसे पूछता हूं जो कहते हैं ये हिजाब देसमें बैन होना चाहिए । क्या ये लोग अपने बीवी और बेटियोंको बगैर दुपट्टेके बाजारमे जाने देंगे ? और जब आवारा लड़के बेटियोंको छेडेंगे और उनपे तंज करेगें तो क्या ये लोग खामोश रह सकेंगे ? कभी नही ।


ऐसे दोगले प्रवृत्तिके लोग जो अपने लिए तो अच्छा चाहते हैं और दुसरोंके लिए बुरा, असलमें ये लोग सभ्य समाज केलिए बीमारी हैं । कोढ़ जैसा रोग जो देखने और सुनने में ही घिनौना आभास होता है । 

औरत सहेजकर मर्यादा और इज्जतके साथ रखनेकी जात है । जितनी कष्ट और पीड़ा औरतोंको सहना पड़ा है शायद ही किसी और को सहना पड़ा हो ।

आज हम शायद ये भूल रहे हैं के जिन महिलाओंको बेनकाब करना चाह रहे हैं वे हमारी माताएं, बहनें और बेटियां भी हैं । हम चाहे जिस भी धर्म और रीत को मानने वाले हों, अपनी मां, बहन, बेटी या पत्निको युरोप और अमेरिकाके बरहना औरतकी तरह देखना पसंद नहीं करेंगे । 


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Saturday, February 12, 2022

हमें क्या करना चाहिए ?



मेरा दोस्त परेशान हालमें कहीं से आया और एक ग्लास पानीकी तलब की । मैंने उसे बैठने को कहा और पानी लेने चला गया । पानी के साथ कमरेमे दाखिल होते ही मेरे दोस्त ने मुझसे सवाल किया, " हम कहां खड़े हैं " ? मैंने उसे पानी पकड़ाई और थोड़ा सा थमके मजाहिया अंदाज़मे जवाब दिया । हम खड़े कहां हैं, हम तो बैठे हुए हैं । वो झुंझलाते हुए बोला " मेरा मतलब ये नही कुछ और है । मैं पूछ रहा हूं,  लोगों को क्या हुआ है ? उसने दूसरा सवाल किया ।मैं उसके चेहरे पे बनती बिगड़ती लकीरों को देखकर उसकी परेशानी की सबब पूछता उससे पहले उसने एक और सवाल किया " लोग अपने काम से काम नहीं रख सकते " ? 



मैंने कहा पहले पानी पियो और थोड़ा सुकून की सांस लो फिर हम जो भी परेशानी है उसपे बात करेंगे । मैंने पंखे का बटन दबाया और एक तकिया उसकी तरफ बढ़ाते हुए रिलैक्स करने को कहकर कमरे से बाहर निकल आया । मैं फिर सोचने लगा कि क्या हुआ है के एक पुरसुकून और खुशमिजाज शख्स इतना परेशान है ?

मैंने जब उसके सवालोंपे गौर किया तो मेरे जेहन में कई तरहके जवाब दौड़ने लगे । मैं कुछ देर और सोचता रहा फिर तय किया के बेहतर होगा अगर हम तहम्मूल और इतमिनानसे इस मौजू पर बात करें और सवालोंके पसमंजारका जायजा लें । जरूरी है किसी सवालके जवाब देने से पहले खूब अच्छी तरह सवाल समझ लिया जाए । उसके सवाल मामूली से लगते हैं मगर उसके पूछनेका अंदाज सादा और मामूली नही हैं ।




मैं जब दुबारा अंदर कमरेमें दाखिल हुआ तो मेरे दोस्त ने वही सवाल फिर दोहराया " हम कहां खड़े हैं ? 

मैंने पूछा बात क्या है ? उसने कहा आजकल लोगों में सब्र बाकी नही रहा । लोग छोटी छोटी बातों पे लड़ रहे हैं । दरगुजर करना और माफ करना तो जैसे कोई चीज ही नहीं रहा । जहां लोग भाईचारा और मोहब्बत की बात करते थे आज लोग नफरत और हिकारतसे एक दुसरेको देखते हैं । सदियोंसे एक साथ रहने वाले लोग आज बेगाने नजर आते हैं ।

मैं चुपचाप उसकी बातें सुन रहा था ।

उसने बात जारी रखते हुए बोला, तुम्ही बताओ अगर कहीं दूर शहरमे किसीका सामान चोरी होजाए तो क्या तुम अपने पड़ोसीको इसका जिम्मेदार बता सकते हो ? मैंने कहा "बिलकुल नहीं " । ये तो सरासर मूर्खता है । 

ये तो एक बात है मैं तुम्हे दूसरी बात बताता हूं, मेरे दोस्त ने कहा ।

मैं ध्यानसे उसकी बातें सुन रहा था । उसने पूछा, क्या शक के बुनियादपे किसीको सजा देना ठीक है ? मैंने कहा "बिलकुल भी नही" । हां, अगर शक है तो पूछताछ कर सकते हैं । किसी ठोस सबूतके बिना किसी नतीजे पर पहुंचना अच्छा नहीं है ।



 

उसने कहा, आजकल समाजमे हक़ीक़तको छुपाकर लोगोंके दिमाग़में एक दुसरेके खिलाफ नफरत भर दिया गया है । लोगोंको बेरोजगार करके उन्हे मजहबके नाम पर उकसाया जा रहा है । क्योंकि कुछ लोग इस बातको अच्छी तरह जानते हैं की लोग काममें रहेंगे तो उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं होगा और नफरतका बाजार नही चलेगा । इसलिए एक संयोजित योजना के तहत युवाओंसे नौकरियां छीनी गईं और फिर छोटे व्यापारियोंके व्यापार बंद कराए गए । आज लोगोंके पास न कोई काम है न पैसा । तो करें तो क्या करें ? 

तुम्हारे कहनेका मकसद क्या है ? मैंने पूछा ।

मेरा दोस्त कहने लगा इस महंगाईके दौरमे जहां जिंदगी गुजारना दुश्वार हो रहा है वहीं चंद लोग नफ़रतका बाजार गर्म करके जीना मुहाल कर रहे हैं । 




लोगोंको शिक्षा, स्वस्थ, रोजगार और देस विकासके मुद्देसे भटका कर धर्म और जातपातकी अनावश्यक तथ्योमें उलझा रहे हैं । इतिहासके सुनहरे पन्ने जहां समृद्धि, भाईचारा और सहिष्णुताके सर्वोत्कृष्ट गाथाएं दर्ज हैं उन्हें मिटानेकी दिनरात कोशिश की जा रही है । विज्ञान और प्रविधिके इस दौरमे लोगोंको झूठे तथ्य बताकर गुमराह किया जा रहा हैं । और लोग सच और झुठके इस शर्मनाक और घिनौनी खेलका पर्दाफाश करने के बजाय अंधभक्त होकर अंधाधुंध दौड़ रहे हैं । 

लोगोंको क्या होगया है ? हम कहां खड़े हैं और कहां जा रहे हैं ? 




मैंने मेरे दोस्तके बातों पे सहमति जताई और कहा कि हमे बीते हुए कल की तरफ देखने के बजाय हमें आगे देखना होगा । विद्यमान परिस्थितिमें जो भी हमारे सामूहिक मुद्दे हैं (जैसे: शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और विकास) उनसे जुड़ी जितनी भी समस्याएं हैं उन्हें एकताबद्ध होकर हल करने होंगे । 

अगर हम गड़े मुर्दे उखाड़ेंगे तो सिर्फ कंकाल ही हाथ लगेंगे जो व्यर्थ है । धर्म, व्यक्तिगत अनुसाशन और व्यक्तित्व विकासकी एक पद्धति है जो इंसानको भद्र, मर्यादित, सहज और अनुशासित बनाता है । 

हमें सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाले तत्वोंसे सावधान रहना होगा ।




हमें कदापि उन मुद्दों और बातोंकी तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए जो हमारे जज्बातको भड़काते हों और हमें भटकाते हों मौलिक आवश्यकताओं और समसामयिक मुद्दोंसे तथा हमे अराजक होने केलिए उत्प्रेरित करते हों ।

हमें इस बातको खूब अच्छी तरह समझना होगा कि धर्म इंसानको सबसे पहले सेवा करना सिखाता है । भाईचारा सिखाता है और एक दुसरेका सम्मान करना सिखाता है । लोग जो कह रहे हैं के हमें इनसे या उनसे खतरा है । हमें किसीसे कोई खतरा नहीं है । खतरा उनसे है जो ये दुष्प्रचार कर रहे हैं कि हमें इनसे या उनसे खतरा है । हमें ऐसे लोगोंसे दूर रहना चाहिए ।


Friday, February 11, 2022

शरीक-ए हयात दौलत, तरीक़-ए हयात है अना


है हाफज़े मे कमी कोई, कुछ याद नही रहता

आगाज़ करता हूं जो कुछ, आबाद नही रहता 


आदमी हूँ आदमी की तरह ही सोचता हूँ मैं

पल में होजाता हूँ कुछ और जांबाज़ नही रहता 


रहूँ दिल मे किसी के मेरी भी ख़्वाहिश है 

मजबूर हूं, खुद से कभी आज़ाद नही रहता 


जब भी मिलता है वो, नई याद छोड़ जाता है

हज़ार यादों में वो खुद मगर याद नही रहता 


खामोश रहने मे भलाई है ऐसा लगता है हसनैन

खून के रिश्ते भी आजकल दराज नही रहता 


सूना पड़ा है वो घर लोग भी चुपचाप रहते हैं 

बचपना रहता था जहाँ कल, आज नही रहता 


बड़े हो गए बच्चे जो क़द से, उम्र से छोटे थे 

अना की बड़ी इमारत में अब प्यार नही रहता 


शायद ज़ेहानतकी कमी है, मिट गए वो लफ्ज़ 

अब बड़ों से गुफ्तगू मे अदब एहतराम नही रहता 


शरीक-ए हयात दौलत, तरीक़-ए हयात है अना 

कौन अपना, कौन बेगाना अब ध्यान नही रहता 


रास्ते जुदा हो जाते हैं, एक ही मंज़िल के लिए 

एक दुसरे पे जब बाहमी एतबार नही रहता 


रिश्तों को समेट कर रखना कहाँ रहा मुमकिन 

वो हो जाता है, जिसका कोइ गुमान नही रहता

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Wednesday, February 9, 2022

हम कौन सा धर्म निभा रहे हैं

 


आप इस बात की शुरुवात जहां से भी करो मुड़कर वही आनी है जहां इसकी जड़ है या असल है ।
सच हमेशा सच रहेगा । आप जितना भी तोडमडोड कर उसे झूट साबित करना चाहो नही होगा । कभी कभी कोई एक जगहों पे ऐसी कोई मिसाल दिखती हैं के बात यानी असल बात कुछ और होता है और दुनिया के सामने कुछ और दिखाया जाता है । वक्त बदलता है और चीजें फिर खुलके सामने आती है और हकीकत अपनी जगह लेलेती है । 

मेरा दोस्त अक्सर इस बातपे बहस करता है और बार बार दोहराता है के सारे फसाद की जड़ मुसलमान हैं । यानी दुनियामे जो खून खराबा है या दहशत का माहौल है सब मुसलमानो की वजह से है । मैं उसे हर बार यही कहता हूं के जो तुम्हे या और लोगोंको दिखाई दे रहा है वो सच नहीं है जो दिखाया जा रहा है । मगर वो नही मानता । मैं उसके साथ जबरदस्ती नहीं कर सकता या उसे किसी तरह मेरे बात से सहमत नही करा सकता क्योंकि उसकी अपनी समझ है लेकिन मैं उसे इस बातकी तरफ लानेकी हमेशा कोशिश करता हूं की वो लोगोंको या मुसलमानोको न देखें जो उसे दिखाई दे रहा है या जो उसे दिखाया जा रहा है । मैं उसे इस बातपे कायल करना चाहता हूं की मैं और वो किस तरह समाज में फैले हुए इस नफरत को मिटा सकते हैं या लोगोंके सोंच या नजरिए को बदलने की कोशिश कर सकते हैं । दुनियामें कोई एक रायको कायम और आम होने में बहोत सारा वक्त लगता है । और जो बरवक्त माहौल है उसे इस हाल तक पहुंचने में जाने कई साल या सदी लगे होंगे । 
क्या सचमे मुसलमान ही फसाद की जड़ है ?


दुनियामे इंसान दो तरहके होते हैं अच्छे और बुरे ।
अच्छाई और भलाई के काम करने वाला अच्छा इंसान और बुराई के काम करने वाला बुरा इंसान । अगर हमें दुनियासे नफरत और बुराई खतम करना है तो हमे दुनियामे अच्छाईकी बोहतात करनी होगी यानी हर जगह अच्छे काम करके दिखाने होंगे । हम एक कौम/मजहब को जिम्मेदार ठहराकर अपनी कमजोरिको नही छुपा सकते । अगर दुनियामे बुराई और फसाद की जड़ मुसलमान हैं तो दूसरे लोग कया कर रहे थे जब बुरा हो रहा था ? क्या अच्छाई इतनी कमजोर पड़ गई दूसरी क़ौमके लोगोंके पास के उस अच्छाई से बुराईको रोक नही सके ? 
ये एक सवाल है हर मजहब के सामने है जो ये दावा करते हैं के मैं और मेरी कौम सच्चे और अच्छे हैं ।


अगर चे वे अच्छे हैं तो कहां हैं उनकी अच्छाई जो लोगोंके दिलों में बैठे गंदको मिटा न सकी ? 
दुसारोंको बुरा कहने से पहले हमे ये देखना होगा के हम कहां कहां बुरे हैं । हमसे कोई नफरत इसलिए करता है के वो हमारी किसी बात से असहमत होता है या उसे हमारे किसी काम से नुकसान पहुंचता है । क्योंकि जो आप महसूस करते हैं हर एक इंसानके साथ वही एहसास होता है । अगर हम किसीको प्रेम करते हैं करुणा, दया और सम्मानसे तो वो भी हमे उसी प्रकार स्नेह करता है, हमारी इज्जत करता है और हमारी भावनाओ का सम्मान करता है । यानी बात ये तय हुआ के जैसा हम करेंगे प्रतिफल वैसा ही मिलेगा ।
तो हमे ये करना चाहिए की किसीपे लांछन लगाने के बजाय हम उन त्रुटियों को ढूंढकर उन्हे ठीक करें और समाज और देशको ये संदेश दें के सिर्फ बुरा कहने से बुराई खतम नही होगा हमे अच्छे काम भी करने होंगे । 
दुनिया में जितने भले लोग गुजरे उन्होंने किसीको बुरा नही कहा बल्कि खुदभी अच्छे काम किए और लोगोंको भी अच्छे कामकी नसीहत की । मैं नहीं कहता हर चीज एकदम से बदल जाएगा मगर हमारी पहली और आखरी कोशिश ये हो के हम खुद अच्छे काम करें और अच्छे कामकी नसीहत करें । और जो बुरे काम करने वाले लोग हैं कब तक बुराइमे लगे रहेंगे । जब हर कोई अच्छाई और भलाई की बात करने लगेगा तो बुराइका पतन स्वतः होजाएगा ।


बुराई की सबसे पहली कारण स्वार्थ है और जबतक दुनियामे स्वार्थी लोग होते रहेंगे हर तरह का फसाद जनम लेता रहेगा ।
जब अरबमे हर जगह फसाद, लूट और कत्ल आम होगया था और लोग सिर्फ ताक़तपे यकीन रखते थे और इसी बलपे जीते भी थे । उनके लिए नैतिक मूल्य और मान्यताएं सिर्फ एक बात रह गई थी तब अल्लाहने हजरत मोहम्मद ( सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम ) को नबी बनाकर भेजा और सिर्फ 23 सालमे आपने सिर्फ अरब नही पूरी दुनियाको जिनेका तौर तरीक़ा सीखा दिया । दुनियाकों तालीम दी की व्यक्तिगत जीवनके क्या नैतिक कर्तव्य हैं और सामाजिक जीवनके क्या आधार हैं । आपने सिखाया व्यक्तिगत हित से ऊपर है सामाजिक हित । आपने बताया परोपकार ही धर्म है । जो भी धार्मिक होगा वो परोपकारी होगा । निस्वार्थ होगा और उसके मनमे सभी केलिए आदर और सम्मान होगा ।

महात्मा गौतम बुद्ध ने क्यों राजगद्दी छोडी ? क्योंकि उन्होंने समाज में विभेद देखा । असमानताएं देखी जो लोगोंको दुखी कर रही थी । उन्होंने सन्यास लिया और पता किया के हर दुख और चिंता का कारण स्वार्थ है । लोगों में त्याग खत्म होगया है और सिर्फ मैं कि भावना बाकी है । उन्होंने लोगोंको अध्यात्मकी तरफ बुलाया और मोह,माया और लालच से छुटकारा दिलाकर समाजमें सुख, शांति और समृद्धि कायम कर दिया ।

महाभारत क्यों हमारे लिए मार्ग दर्शन नही बन रहा है ? 
क्योंकि आज हम अपना धर्म भूल गए । आज लोग सिर्फ दिखावा करते हैं । तरह तरह के भेष धारण करते हैं और दूसरों के खिलाफ नफरत की बात करते हैं । मारने और खत्म करने की बात करते हैं ।
हम कौन सा धर्म पालन कर रहे हैं ?

" हमे याद रखना चाहिए हम किसी भी धर्मके अनुयायी होने से पहले एक इंसान हैं और हमारा पहला और अंतिम धर्म सिर्फ इंसानियत है ।"